चारों मठ भारतीय संस्कृति और वेदों के केंद्र हैं - आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठ
जिस प्रकार भारत में चार
धाम स्थित हैं, उसी प्रकार
चार दिशाओं में चार मठ हैं।
यह चारों मठ भारतीय
संस्कृति और वेदों के
केंद्र हैं।
इन चार मठों की स्थापना
सातवीं शताब्दी में जन्मे,
शंकर का अवतार कहे जाने
वाले आदि शंकराचार्य ने की
थी।
सातवीं और आठवीं शताब्दी
में, जब सनातन धर्म की
प्रतिष्ठा जैन और बौद्धों
के कारण क्षीण हो गई थी, तब
केरल में जन्मे मात्र छह
वर्ष के बालक आदि शंकर ने
पूर्व से पश्चिम और उतर से
दक्षिण तक यात्राएं कर,
शास्त्रार्थ कर, भाष्य लिख
कर वैदिक सनातन धर्म की
पुनर्स्थापना की।
आदि शंकराचार्य ने वैदिक
धर्म की पुनर्स्थापना और
शोध के लिए भारत की चार
दिशाओं में चार मठों की
स्थापना की। चारों मठ,
चारों वेदों को समर्पित
माने जाते हैं|
शंकराचार्य ने इन मठों की
स्थापना के साथ ही उनके
मठाधीशों की भी नियुक्ति
की, जो बाद में स्वयं
शंकराचार्य कहे जाते हैं।
यही कारण है कि चारों मठों
के प्रमुख को शंकराचार्य ही
कहते हैं। हिन्दू धर्म की
एकजुटता और व्यवस्था के लिए
चार मठों की परम्परा को
जानना आवश्यक है।
यह चारों मठ वेद और ज्ञान के
अनुसन्धान के प्रमुख
केंद्र माने जाते हैं।
आदि शंकरचार्य वेदों के परम
ज्ञाता थे, और अलौकिक
व्यक्तित्व के धनी थे। उनका
जन्म केरल के कालडी ग्राम
में हुआ था और मात्र ३२ वर्ष
की अवस्था में उन्होंने
शरीर त्याग दिया था।
उन्होंने हिन्दू धर्म को
पुर्नस्थापित और
प्रतिष्ठित किया। अपने
तर्कों और शास्त्रार्थों
के माध्यम से उन्होंने
विभिन्न मान्यताओं में
वांछित सुधार कर उन्हें
मुख्य धारा में जोड़ने का
कार्य किया। उन्होंने
अद्वैत चिंतन को
पुनर्जीवित कर सनातन
हिन्दू धर्म के दार्शनिक
आधार को मज़बूत किया। उनका
कहना था कि आत्मा और
परमात्मा एक ही हैं।
अज्ञानता के कारण ही यह
दोनों हमें अलग – अलग
प्रतीत होते हैं।
वहीं, दूसरी ओर उन्होंने
जनसामान्य में प्रचलित
मूर्ति पूजा का औचित्य
स्पष्ट करने का भी प्रयास
किया। उन्होंने भारतीय
सनातन परम्परा को सम्पूर्ण
देश में फैलाने के लिए भारत
की चारों दिशाओं में चार
शंकराचार्य मठों की
स्थापना की थी।
ये चारों मठ भारत को, उनकी ओर
से अप्रतिम भेंट है। यह मठ
आज भी चार शंकराचार्यों के
नेतृत्व में सनातन परम्परा
का प्रचार – प्रसार कर रहे
हैं। यह मठ गुरू – शिष्य
परम्परा के निर्वहन का
मुख्य केंद्र हैं। इन चार
मठों में शिष्यों को
संन्यास की दीक्षा दी जाती
है। सभी मठ अलग – अलग वेदों
के प्रचारक होते हैं और
इनका एक विशेष महावाक्य
होता है। मठों को पीठ भी कहा
जाता है।
भारत के चार मठ –
गोवर्धन मठ –
भारत की पूर्व दिशा में
गोवर्धन मठ स्थित है।
यह उड़ीसा राज्य के पुरी
नगर में है।
गोवर्धन मठ ऋग्वेद को
समर्पित है।
गोवर्धन मठ के अंतर्गत
दीक्षा प्राप्त करने वाले
सन्यासियों के नाम के पीछे
'आरण्य' विशेषण लगाया जाता
है, जिससे उन्हें उक्त
संप्रदाय का संन्यासी माना
जाता है।
इस मठ का महावाक्य
'प्रज्ञानं ब्रह्म' है।
इस मठ के प्रथम मठाधीश आघ
शंकराचार्य के प्रथम शिष्य
पद्मपाद हुए।
शारदा मठ –
भारत के पश्चिम में शारदा
मठ कालका मठ है।
यह गुजरात के द्वारका धाम
में स्थित है |
यह सामवेद को समर्पित है।
शारदा मठ के अन्तर्गत
दीक्षा प्राप्त करने वाले
संन्यासियों के नाम के बाद
'तीर्थ' और 'आश्रम' सम्प्रदाय
नाम विशेषण लगाया जाता है,
जिससे उन्हें उक्त
सम्प्रदाय का संन्यासी
माना जाता है।
इस मठ का महावाक्य
'तत्त्वमसि' है।
शारदा मठ के प्रथम मठाधीश
हस्तामलक पृथ्वीधर थे।
हस्तामलक शंकराचार्य के
प्रमुख चार शिष्यों में एक
थे।
ज्योर्तिमठ -
भारत की उत्तर दिशा में
'ज्योतिर्मठ' स्थित है।
यह उत्तराखंड के
बद्रिकाश्रम में स्थित है।
ज्योतिर्मठ अथर्ववेद को
समर्पित है।
ज्योर्तिमठ के अन्तर्गत
दीक्षा प्राप्त करने वाले
संन्यासियों के नाम के बाद
'गिरि', 'पर्वत' और ‘सागर’
विशेषण लगाया जाता है,
जिससे उन्हें उक्त
सम्प्रदाय का संन्यासी
माना जाता है।
इस मठ का महावाक्य
'अयमात्मा ब्रह्म' है।
ज्योर्तिमठ के प्रथम
मठाधीश आचार्य तोटक बनाए गए
थे।
श्रृंगेरी मठ -
भारत की दक्षिण दिशा में
श्रृंगेरी मठ स्थित है।
यह कर्णाटक के चिकमंगलूर
में स्थित है।
श्रृंगेरी मठ यजुर्वेद को
समर्पित है।
श्रृंगेरी मठ के अन्तर्गत
दीक्षा प्राप्त करने वाले
संन्यासियों के नाम के बाद
‘सरस्वती’, ‘भारती’ और
‘पुरी’ सम्प्रदाय नाम
विशेषण लगाया जाता है,
जिससे उन्हें उक्त
सम्प्रदाय का संन्यासी
माना जाता है।
इस मठ का महावाक्य 'अहं
ब्रह्मास्मि' है।
इस मठ के प्रथम मठाधीश
आचार्य सुरेश्वर थे, जिनका
पूर्व में नाम मण्डन मिश्र
था।
Comments
Post a Comment