आप अपने बच्चों की परवरिश कैसे करें? क्या कोई कमी तो नहीं रह गई? श्री मनोहर दास जी महाराज।

सभी दर्शकों को ॐ ब्रह्म सत्यं के परिवार की ओर से हार्दिक शुभ मंगलकामनाएं।
आज का विषय है : "बच्चों की परवरिश"

बच्चों से ही हमारा जीवन है और बच्चों की परवरिश में कोई कमी रह गई तो आप मान के चलिएगा कि आपका जीवन नर्क हो जाएगा।

बच्चे शिक्षित नहीं निकले, योग्य नहीं हो पाए, परवरिश में कहीं ऐसी कोई कमी रह गई जिससे आप लोगों कॆ बीच में प्रेम नहीं बन पाया उनसे, तो बुढ़ापा आपका खराब हो जाएगा।
आप बच्चों के लिए ना सही,आपका अपना बुढ़ापा खराब ना हो, उसके लिए आप बच्चों की परवरिश अपनी तरह से करें, अपना तरीका मतलब हमारे धर्म के अनुसार चलें, हमारे शास्त्रों के अनुसार अपने बच्चों की परवरिश करें।

बड़ी विडंबना की बात है आज के समय में, बच्चों की परवरिश के लिए कोई आया रख लेते हैं और हम खुद व्यस्त हो जाते हैं अपने अपने कामों में। कोई व्यापार में लग जाते हैं और कोई नौकरी करने चले जाते हैं, इसी वजह से हम बच्चों से अच्छे से मिल नहीं पाते और बात नहीं कर पाते।

एक छोटा सा उदाहरण भगवान श्री कृष्ण का: मां यशोदा और भगवान कृष्ण की बाल लीला।
आप हम सबको पता है कि नंद बाबा के पास 900000 गाय हुआ करती थीं। इसीलिए उनको नंद कहा जाता था। उनके घर में कोई कमी नहीं थी, काम करने वालों की कोई कमी नहीं थी। जिनके पास 900000 गाय होंगी उनके पास काम करने वालों की कमी कहां।

लेकिन मां यशोदा अपने कान्हा के लिए सब काम छोड़ छाड़ कर स्वयं भोजन बनाती थी, माखन निकालती थीं और दूध पिलाया करती थीं। इससे हमें क्या शिक्षा मिलती है? इससे हमें यह शिक्षा मिलती है कि हम हमारे घर में, परिवार में तथा बच्चों को अपने हाथ से खाना बनाकर खिलाएं। नौकर की सेवाओं में कभी वह भाव नहीं आते हैं क्योंकि वह स्वार्थ के साथ हमारे लिए काम करते हैं जिसका प्रभाव अच्छा नहीं रहता हमारे बच्चों के लिए। हमें स्वयं अपने बच्चों के लिए खाना बनाना चाहिए, लंच बनाना चाहिए। उनको खिलाना चाहिए और उनके सभी काम अपने खुद के प्रत्यत्नों से करने चाहिए।
5 वर्ष तक के बालकों को हमें बहुत ज्यादा प्रेम करना चाहिए, 6 से 15 साल तक की उम्र में हमें उन पर अंकुश रखना चाहिए, 15 वर्ष की उम्र के बाद हमें उसके साथ मित्रवत व्यवहार रखना चाहिए। जिस घर में ऐसी परंपराएं होती हैं वह बच्चे बहुत ही श्रेष्ठ होते हैं। उनको आगे बढ़ने में मदद मिलती है और वह आत्मविश्वास से भर जाते हैं और आगे चलकर वह आपके बुढ़ापे में आपके आज्ञाकारी व् देखभाल करने वाले बालक बन जाते हैं।

जैसे आजकल के लोग और खासकर के औरतें किटी पार्टीज में जाने लगी हैं और अपने बच्चों को खुद पर छोड़के चली जाती हैं, वह ये भूल जाती हैं की आगे आने वाले समय में ये जो हमारे बच्चे हैं, ये जो पौधे हैं कहीं इनमे दीमक न लग जाए, कहीं इनमें कीड़े नहीं लग जाएं जिसकी वजह से कोई विकार पैदा हो जाए और आप लोगों के प्रति कोई घृणा हो जाए या रास्ते भटक जाएं इसलिए हमें अपने बच्चों की परवरिष बड़े ध्यान से करनी चाहिए।
जैसे की एक छोटा सा पौधा एक माली की निगरानी में रहता है, माली उससे तब तक अच्छे से परवरिश करता है जब तक वह अच्छे से ऑक्सीजन लेने लायक नहीं हो जाता है, इसी प्रकार से हमें अपने छोटे से बच्चे को - नन्हे से बच्चे को जब तक वह १८ या १९ साल का नहीं हो जाये तब तक हम उसकी पूरी परवरिश करें और उसका पूरा ध्यान रखें।

अपने बच्चों का मन भगवन के प्रति लगाएं। उसके लिए सबसे पहले हमें अपना मन भगवन के प्रति लगाना होगा। ध्यान रखिये अगर आप अपने बच्चों को भगवान् की आराधना में लगते हैं, और उनके साथ मित्रवत स्वाभाव रखते हैं उनकी १५ वर्ष की आयु में, निश्चित रूप से आपके बच्चे संस्कारी हो जाएंगे और सुख समृद्धि की और आपका अपना जीवन चला जायेगा।

चलिए आगे हम इसी तरह से आपके लिए नयी नयी बातें लेकर आते रहेंगे, हमसे जुड़े रहिये ॐ ब्रह्मा सत्यम चैनल से और आगे फिर पुनः मिलेंगे।

शुभम भूयात , शुभम भूयात , शुभम भूयात।

Comments

Popular posts from this blog

चारों मठ भारतीय संस्कृति और वेदों के केंद्र हैं - आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठ